कहानी पेंसिल की
तो आज मैं कुछ सृजनात्मक लेखन करने की सोच रहा था ...की तभी मैंने अपनी छोटी बेहेन को पेंसिल से ड्राइंग करते देखा और ख्यालों में खो सा गया। मुझे याद आने लगे बचपन के दिन जब में भी पेंसिल से बोहोत खेला करता था खेलने को ज्यादा कुछ नहीं था मेरे पास उस समय और बचपने में खिलोनो की जरुरत किसे होती थी। मैं तो सारा दिन पेंसिल लेके इधर उधर कभी कॉपी तो कभी किताबों में, तो कभी दीवारों पर लिखता नहीं तो चित्र तो बना ही देता था। हलाकि मेरी लिखावट कुछ ख़ास नहीं थी शायद इस लिए डाँट भी बोहोत खाता था। आज जब मैंने अपनी बेहेन को ड्राइंग करते देखा तो उसके पास तो बोहोत सारी पेंसिल थी तो मै अचम्भे में पड़ गया और उससे पुछा की इतनी सारी पेंसिल का तुम करती क्या हो, उस्सने मुझे बताय की हर पेंसिल का काम अलग है। मै थोड़ी देर रुका फिर पुछा "वो कैसे "उसने बताया की " एक ड्राइंग के लिए है एक ड्राइंग को डार्क करने के लिए ये शेडिंग के लिए ये डार्क शेडिंग के ..... " और अनेक तरह की चीज...