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Showing posts from September, 2019

कोशिश

आज फ़िर कुछ नहीं केह पाया। क्या कहूं? शायद कुछ कहना ही नहीं था। बस कहना था कि कोशिश पुरी की मैंने। पर वो भी शायद यकीं से नहीं कहना था।

टेढ़ी कुर्सी

कुर्सी पर बैठा हूं तो दो पैर हवा में है, चार पैर जमीन पर ना आ जाएं इसका डर है मुझे। कभी आते हैं चार पैर जमीन पर तो बस खट्ट कि आवाज़ करने को। खट्ट की आवाज़ आते ही, फ़िर दो पैर हवा में हैं, दो पर अभी भी जमीं पर है।