चाय के टपरी पर बैठे नमन के मन में एक बार को खयाल आया, की हाल ए दिल का ब्योरा दे ही दे इस बार सामने बैठी श्रद्धा को, लेकिन वो कुछ बोल पाता उससे पहले श्रद्धा बोल पड़ी " चश्मा कहा है तुम्हारा?" "टूट गया था कल" "तो तुझे सब दिख तो रहा है ना?" "हां अंधा थोड़ी हूं यार" "हुं... वैसे बिना चश्मे के सही दिखते हो" मुस्कुराते हुए श्रद्धा ने कहा "क्या सही में ?" उत्सुक मन से "हां" बेपरवाही से "और चश्में के साथ?" "चासमुद्दीन" चुहल लेते हुए श्रद्धा ने बोला और इसी के साथ नमन का मुं सिकुड़ गया, उसके बाद उसकी ओर श्रद्धा की थोड़ी बोहोत बात तो हुई लेकिन ये चश्मुद्दीन का जो आज टैग मिला है, उससे हट के नमन के दिमाग में कुछ और चल नही रहा था अब उसने मन बना लिया था की अब तो वो कॉन्टैक्ट लेंस ले के रहेगा क्यों की लसिंक सर्जरी की अभी उसकी उम्र नही हुई थी और न उसके पास पैसे ही थे, पैसे तो वैसे कॉन्टैक्ट लेंस लेने के भी नही थे। घर पर पहुंचते ही उसने ऐलान कर दिया की "हमको चाहिए कॉन्टैक्ट लेंस " सब ने एक नजर देखा फि...
पांव के पास पड़ी पायल उठा लो उसे बचा लो खारे पानी से काली परत से बचा के संभाल के रख दो अलमारी में शान से दिखाना रिश्तेदारों को बताना किस तरह चमकती है ये पायल फिर हाथों से झटक के खनक भी सुनाना फिर उठा के बंद करदेना बक्से में कहीं जहां सुरक्षित हो बस वहीं पैरों के आभूषण को गले से लगाना हाथ में दिखाना मौसम से बचाना नजरों से बचाना इधर टिकना उधर टिकाना पर पैर मत लगाना
ज़िन्दगी भर एक मलाल रहेगा मेरे जेहन में ये सवाल रहेगा कि शिद्दत भरी आरज़ू हुई कभी? की हर तरह का लुभाव हुआ है? ख्वाब मेरे ही थे की किताबों का प्रभाव हुआ है? खयाल मेरे ही थे की यादों का अभाव हुआ है? विचित्र इस वेश भूषा के पीछे छिपे इस विकृत मन का जन्म अपने आप हुआ है? की यहां भी मिलावट का इस्तेमाल हुआ है?
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