चश्मुद्दीन
चाय के टपरी पर बैठे नमन के मन में एक बार को खयाल आया, की हाल ए दिल का ब्योरा दे ही दे इस बार सामने बैठी श्रद्धा को, लेकिन वो कुछ बोल पाता उससे पहले श्रद्धा बोल पड़ी " चश्मा कहा है तुम्हारा?"
"टूट गया था कल"
"तो तुझे सब दिख तो रहा है ना?"
"हां अंधा थोड़ी हूं यार"
"हुं... वैसे बिना चश्मे के सही दिखते हो" मुस्कुराते हुए श्रद्धा ने कहा
"क्या सही में ?" उत्सुक मन से
"हां" बेपरवाही से
"और चश्में के साथ?"
"चासमुद्दीन" चुहल लेते हुए श्रद्धा ने बोला
और इसी के साथ नमन का मुं सिकुड़ गया, उसके बाद उसकी ओर श्रद्धा की थोड़ी बोहोत बात तो हुई लेकिन ये चश्मुद्दीन का जो आज टैग मिला है, उससे हट के नमन के दिमाग में कुछ और चल नही रहा था अब उसने मन बना लिया था की अब तो वो कॉन्टैक्ट लेंस ले के रहेगा क्यों की लसिंक सर्जरी की अभी उसकी उम्र नही हुई थी और न उसके पास पैसे ही थे, पैसे तो वैसे कॉन्टैक्ट लेंस लेने के भी नही थे।
घर पर पहुंचते ही उसने ऐलान कर दिया की
"हमको चाहिए कॉन्टैक्ट लेंस "
सब ने एक नजर देखा फिर अपने काम में लग गए लेकिन
बड़ी बहन ने अपना फोन नीचे रखकर पूछा
"क्यूं चाहिए ?"
"क्यूं की मुझे जरूरत है उसकी ओर क्या?"
"तो चश्में लेने में क्या दिक्कत है तेरेको?"
"चश्मे तो मैं तोड़ता रहता हूं अब एक बार कॉन्टैक्ट्स भी आज़मा ही लेता हूं"
"अच्छा!" व्यंग के साथ कहते हुए दीदी पैसे निकाल ही रही थी की पापा जी ने रोक दिया
"कोई जरूरत नहीं है इसे लेंस की, मैंने कभी पहने हैं लेंस?
५० की उम्र हो गई मेरी, मुझे तो कभी ऐसा नहीं लगा की चलो भई कॉन्टैक्ट्स पहनते हैं आज!"
"हां तो बीस की उम्र में शादी भी तो हो गई थी, लेंस पहन के क्या ही उखाड़ लेते" एक पल का सन्नाटा फिर कुछ एक सेकंड बाद दीदी हंस पड़ी फिर मम्मी भी हंस पड़ी और पापा भी, सब हंसने लगे फिर कुछ समय बाद जब सब की हसी रुकी फिर पापा ने दोहराया
"अभी लेंस की कोई जरूरत नही है कल महेश के यहां से ऐनक ले लेना जा के, २ घंटे में बना के दे देते हैं और हां! बैकअप में भी एक चश्मा बनवा लेना"
"अरे महेश चाचा के पास तो सारे पुराने मॉडल के फ्रेम्स रेहतें हैं, उन्हें तो कोई ५० साल का बुद्धा भी नही पहनेगा" नमन बोल पड़ा
"अच्छा" सांस छोड़ते हुए पापा ने कहा मम्मी और दीदी इस बार हसी रोक पाने में काबिल थीं
"ठीक है भाई! दिला दो ना इसे" मां ने प्यार से कहा
"अरे तुम तो बस... तुम्हारी वजह से हो गया है ये इतना लहगर" पापा ने गरम होकर बोला
इससे पहले की झगड़ा बढ़ता नमन बोल पड़ा
"ठीक है मत दिलाओ चश्मा" बोलते ही नमन बिजली की तरह कोंध के बाहर निकल आया, अब उसके पास क्या ही चारा बचा था वो किसी से क्या बात करता इसके बारे में उसकी एक ही तो दोस्त है, और वो श्रद्धा ही है बाकी किसी को वो इतना करीब समझता नही है, इसी सोच में पड़ा था की सिर के पीछे सताक से एक चाटा पड़ा और वो घूमा तेजी से तो देखा वो उसकी दीदी थी।
उन्होंने २००० का नोट पकड़ाया और कहा
"कि इतने हैं अभी तो, पैसे बचे तो रख लियो और अगर कम पड़ गए तो देख लियो खुद ही, मेरे पास मत आइयो बस"
बोलकर वो अंदर चली गईं वापिस, नमन ने पैसे लिए और लेंसकार्ट की स्टोर पे पहुंच गया एक लेंस उसने चुना और ऑर्डर कर दिया, लेंस को आने में दो-तीन दिन का समय था और ये समय बाकी समय की तरह नहीं था जब नमन "एमजॉन" से कोई किताब या कोई और आइटम मंगाता खैर समय बीत ही गया और लेंस आ भी गया,
"यूटयूब" से कोटैक्ट्स को चढ़ाने और उतारने की वीडियो को ऑफलाइन कर लिया गया क्यों की अपने नेटवर्क की स्पीड पर अब उसका कोई भरोसा रहा नही था ।
घर पहुंचा अपने कमरे में गया और लेंस को लगाने लगा करीब एक घंटा लगा होगा उसे कॉन्टैक्ट्स को पहनने में,
पहनने के बाद घर से आजाद परिंदे की तरह वो निकला, आंखों की जलन का तो कोई फर्क ही नहीं था जनाब पे।
अगले दिन मन बना लिया की श्रद्धा से एक और बार मिला जाए और बताया जाए की अब वो कभी चश्मा नहीं पहनेगा
उसकी सुंदर आंखें ( हालही की परिस्थितियों से हुई अनुभूति) अब दुनिया दिखेंगी और दुनिया उसकी सुंदर आंखें।
अगले दिन सुबह वो श्रद्धा से मिलने के लिए निकलता है रविवार की सुबह आज और भी ज़्यादा सुंदर थी जिसमे सुबह - सुबह उठने का गम भी नही था, वो रास्ते पे जा ही रहा होता है बैटरी रिक्शा की सवारी करते हुए, एक कंकड़ उसकी आंखों में पड़ता है वो बिना ध्यान के अपनी आंखें रगड़ता है और फिर हाथ हटाता है और देखता है की उसे सब धुंधला दिख रहा है शायद लेंस गिर गया है अंदाजा लगते ही रिक्शे को रोकने को कहता है एक बार में वो रुकता नही तो ज़ोर लगा के बोलता है
" रोको यार!"
" हां कट पे रोकतें हैं" बेपरवाही से रिक्शे वाले ने बोला
"अरे अभी रोको"
"ठीक है रोक लिया भाई"
रिक्शे के रुकते ही नमन अपने धुंधले बिनाई से हर तरफ़ देखता है उससे कुछ नही दिखता तब बगल में बैठे हुए अंकल अपने हाथ आगे बढ़ते हैं और उसे लेंस थमातें हैं और उसको केस में डाल देता है ताकि सॉल्यूशन से वो साफ हो जाए फिर रिक्शे से उतरकर पब्लिक शौचालय में जाता है और लेंस फिर पहन लेता है।
काफी समय देर पहुंचता है देखता है की श्रद्धा तो अभी भी नही है यहां पे उसका इंतज़ार करने लगता है। पीछे से आके श्रद्धा आंखों पे हाथ रखती है, नमन बोल पड़ता है
"अबे यार ये तो इतना 'ऑब्वियस' है"
"अबे पता है मुझे, चल आंखें बंद कर और धीरे-धीरे घूम"
नमन धीरे-धीरे आंखें बंद किए घूमता है
फिर श्रद्धा कहती है "अब खोल आंखें"
नमन आंखें खोलता है तो देखता है की श्रद्धा ने चश्मा पहन रक्खा है
"ये क्या हो गया तुझे?" नमन असमंजस में पूछता है
"क्या हो गया क्या चश्मा लगा है परसो ही चेकअप कराया था। तेरा चश्मा कहां है?"
नमन क्या ही जवान देता उसने कहा
"अभी तक बनवाया नही है"
"चल कोई न मै तेरे लिए कुछ लाई हूं " कहते हुए उसे एक फ्रेम दे देती है फिर बोलती है "तेरे पैसे बचा लिए मैने और हां एक बैकअप फ्रेम रक्खा कर हमेशा"
नमन क्या ही बोलता उसने फ्रेम निकाला और पहना
और पेहन के श्रद्धा की तरफ़ मुड़ा और कहा
"अब तो हम दोनों ही चहमुद्दीन हो गए"
श्रद्धा फिर मुस्कुराती है।
Comments
Post a Comment