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Showing posts from March, 2021

सफर से लोट के जब आतें हैं

जब हम सफर से लोट के आतें हैं तो अक्सर कोई अलग ऊर्जा लातें हैं ये ऊर्जा बहुत चीजों का मिश्रण है इसमें किसी की नजर से पैदा हुआ उत्साह भी है तो उससे बात न कर पाने का गम भी नई मोहोल में पुरानी यादों पे एक नया दृष्टिकोण भी है तो एक कविता की आहट भी है उसे लिख न पाने का अफसोस भी है नई जगह पे मिले लोगों का उत्साह भी है उनसे बिदाई का दुख भी है किसी नए रास्ते पे चलके उसको  अपना बनाने का अनुभव भी है तो उसे भुला देने का खालीपन भी है नए सामानों पे पड़े सस्ते दामों का हल्ला है तो उन समान के सही न निकलने की निराशा भी है नए नए पकवान का स्वाद भी है तो उनसे अगले दिन पेट खराब भी है ये अलग है सफर का अनुभव  इसमें शायद जिंदगी का मिनिएचर अनुभव है सारी घटनाएं एक छोटे से अंतराल में सिकुड़ जाति हैं उम्र कुछ ही दिनों में कई साल बढ़ जाती है यही शायद सफर का अर्थ है हम यात्रा भले ही बाहर करतें हैं लेकिन सफर तो मन के भीतर ही होता है यह अनुभव, यह सफर, यह ऊर्जा ये शायद एक ही रास्ते पे आने वाले अनेक स्टॉपेज हैं जिंदगी के और ज़िंदगी है कोई लोहपथ गामिनी

चश्मुद्दीन

चाय के टपरी पर बैठे नमन के मन में एक बार को खयाल आया, की हाल ए दिल का ब्योरा दे ही दे इस बार सामने बैठी श्रद्धा को, लेकिन वो कुछ बोल पाता उससे पहले श्रद्धा बोल पड़ी " चश्मा कहा है तुम्हारा?" "टूट गया था कल" "तो तुझे सब दिख तो रहा है ना?" "हां अंधा थोड़ी हूं यार" "हुं... वैसे बिना चश्मे के सही दिखते हो" मुस्कुराते हुए श्रद्धा ने कहा "क्या सही में ?" उत्सुक मन से  "हां" बेपरवाही से "और चश्में के साथ?" "चासमुद्दीन" चुहल लेते हुए श्रद्धा ने बोला और इसी के साथ नमन का मुं सिकुड़ गया, उसके बाद उसकी ओर श्रद्धा की थोड़ी बोहोत बात तो हुई लेकिन ये चश्मुद्दीन का जो आज टैग मिला है, उससे हट के नमन के दिमाग में कुछ और चल नही रहा था अब उसने मन बना लिया था की अब तो वो कॉन्टैक्ट लेंस ले के रहेगा क्यों की लसिंक सर्जरी की अभी उसकी उम्र नही हुई थी और न उसके पास पैसे ही थे, पैसे तो वैसे कॉन्टैक्ट लेंस लेने के भी नही थे।  घर पर पहुंचते ही उसने ऐलान कर दिया की  "हमको चाहिए कॉन्टैक्ट लेंस "  सब ने एक नजर देखा फि...

एक सवाल

ज़िन्दगी भर एक मलाल रहेगा मेरे जेहन में ये सवाल रहेगा कि शिद्दत भरी आरज़ू हुई कभी? की हर तरह का लुभाव हुआ है?  ख्वाब मेरे ही थे  की किताबों का प्रभाव हुआ है? खयाल मेरे ही थे की यादों का अभाव हुआ है? विचित्र इस वेश भूषा के पीछे  छिपे इस विकृत मन का जन्म अपने आप हुआ है? की यहां भी मिलावट का इस्तेमाल हुआ है?