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Showing posts from 2021

ख़बर-चस्पा

इक नई खबर किसी ने उठाई अपनी स्टोरी पे चस्पा किसी दूसरे ने उठाई ये स्टोरी  अपनी स्टोरी पे चस्पा चस्पा कर - कर के  लोगों ने लंबी कतार बना दी खबर छूटी पीछे अफवाओं ने हवा बना दी नष्ट हुए सदाचार गालियों ने महफिल सजा दी नज़र पड़ी मासूम की वो भावनाओं में फंस गया अगले दिन उसने किसी पे गोली चला दी फिर... ख़बर सुनी मैंने उठाई और  अपनी स्टोरी पे चस्पा

हाथों की पायल

पांव के पास पड़ी पायल उठा लो उसे बचा लो खारे पानी से काली परत से बचा के  संभाल के रख दो अलमारी में शान से दिखाना  रिश्तेदारों को बताना  किस तरह चमकती है ये पायल फिर हाथों से झटक के  खनक भी सुनाना फिर उठा के बंद करदेना बक्से में कहीं जहां सुरक्षित हो बस वहीं पैरों के आभूषण को गले से लगाना  हाथ में दिखाना मौसम से बचाना नजरों से बचाना इधर टिकना  उधर टिकाना पर पैर मत लगाना

अस्तित्व

ये कविता आखिर होती क्या है हाल-ए-दिल का बयान ही तो है फिर सरल सी बात को कहने को ये चांद, तारो, फूल, बगीचों के इस्तेमाल का क्या अर्थ है ये बेपनाह मोहबत्त के एहसास भौतिक माप दंड में इनका क्या अर्थ है भावना का सही माप तो स्वाद में है मुझे गुलाब जामुन सी लगी उसकी आरज़ू कितना सुंदर और घिनौना है ये वाक्य लेकिन रस तो आपके मन में ही है इसपे बेवजह झगड़ते गुजरते वक्त का क्या अर्थ है कविता बेवजह ही है साहित्य बेवजह ही है वजह है अस्तित्व का कुछ यूं जैसे दूर किसी आकाश गंगा में दो ग्रहों के टकराने की घटित घटना का एक मात्र साक्षी है वक्त लेकिन वक्त की साक्षी व अनुभूति का अर्थ मेरे अस्तित्व से ही तो है

सफर से लोट के जब आतें हैं

जब हम सफर से लोट के आतें हैं तो अक्सर कोई अलग ऊर्जा लातें हैं ये ऊर्जा बहुत चीजों का मिश्रण है इसमें किसी की नजर से पैदा हुआ उत्साह भी है तो उससे बात न कर पाने का गम भी नई मोहोल में पुरानी यादों पे एक नया दृष्टिकोण भी है तो एक कविता की आहट भी है उसे लिख न पाने का अफसोस भी है नई जगह पे मिले लोगों का उत्साह भी है उनसे बिदाई का दुख भी है किसी नए रास्ते पे चलके उसको  अपना बनाने का अनुभव भी है तो उसे भुला देने का खालीपन भी है नए सामानों पे पड़े सस्ते दामों का हल्ला है तो उन समान के सही न निकलने की निराशा भी है नए नए पकवान का स्वाद भी है तो उनसे अगले दिन पेट खराब भी है ये अलग है सफर का अनुभव  इसमें शायद जिंदगी का मिनिएचर अनुभव है सारी घटनाएं एक छोटे से अंतराल में सिकुड़ जाति हैं उम्र कुछ ही दिनों में कई साल बढ़ जाती है यही शायद सफर का अर्थ है हम यात्रा भले ही बाहर करतें हैं लेकिन सफर तो मन के भीतर ही होता है यह अनुभव, यह सफर, यह ऊर्जा ये शायद एक ही रास्ते पे आने वाले अनेक स्टॉपेज हैं जिंदगी के और ज़िंदगी है कोई लोहपथ गामिनी

चश्मुद्दीन

चाय के टपरी पर बैठे नमन के मन में एक बार को खयाल आया, की हाल ए दिल का ब्योरा दे ही दे इस बार सामने बैठी श्रद्धा को, लेकिन वो कुछ बोल पाता उससे पहले श्रद्धा बोल पड़ी " चश्मा कहा है तुम्हारा?" "टूट गया था कल" "तो तुझे सब दिख तो रहा है ना?" "हां अंधा थोड़ी हूं यार" "हुं... वैसे बिना चश्मे के सही दिखते हो" मुस्कुराते हुए श्रद्धा ने कहा "क्या सही में ?" उत्सुक मन से  "हां" बेपरवाही से "और चश्में के साथ?" "चासमुद्दीन" चुहल लेते हुए श्रद्धा ने बोला और इसी के साथ नमन का मुं सिकुड़ गया, उसके बाद उसकी ओर श्रद्धा की थोड़ी बोहोत बात तो हुई लेकिन ये चश्मुद्दीन का जो आज टैग मिला है, उससे हट के नमन के दिमाग में कुछ और चल नही रहा था अब उसने मन बना लिया था की अब तो वो कॉन्टैक्ट लेंस ले के रहेगा क्यों की लसिंक सर्जरी की अभी उसकी उम्र नही हुई थी और न उसके पास पैसे ही थे, पैसे तो वैसे कॉन्टैक्ट लेंस लेने के भी नही थे।  घर पर पहुंचते ही उसने ऐलान कर दिया की  "हमको चाहिए कॉन्टैक्ट लेंस "  सब ने एक नजर देखा फि...

एक सवाल

ज़िन्दगी भर एक मलाल रहेगा मेरे जेहन में ये सवाल रहेगा कि शिद्दत भरी आरज़ू हुई कभी? की हर तरह का लुभाव हुआ है?  ख्वाब मेरे ही थे  की किताबों का प्रभाव हुआ है? खयाल मेरे ही थे की यादों का अभाव हुआ है? विचित्र इस वेश भूषा के पीछे  छिपे इस विकृत मन का जन्म अपने आप हुआ है? की यहां भी मिलावट का इस्तेमाल हुआ है?

separation

In the silence we r United Expressions separates  Consciousness from its Limbs we amputate. We gather people  Not their ideas. We celebrate awards  Accomplishments are abandoned Hope we do to prosper Yet we do not respect opinions. We r divided and hence  Ego conquers our mind Make us unstable.

हस्ते मुस्कुराते चेहरे

एक हस्ता चेहरा, एक मुस्कुराता चेहरा दोनों में "कॉमन" कुछ भी नहीं मुस्कान वो खुशी है जो हसी तक नहीं पहुंची और मुस्कान अपने आप में कुछ खास नहीं वो निर्भर है आपके "एंट्राज" पर, हालाकि वो किसी भी ऐर-गैरे के साथ नहीं आती  और अगर आती है तो नपी-तुली आती है लेकिन हसी तो बेबाक है, एक शेर की दहाड़ है, और हम अभिनेताओं की हसी भी कोई हसी है,  वो तो है अभिनय एक रास्ता किसी किरदार मै उतरने वो नकली है हर कोशिश के बाद जैसे नकली है अभिनेता का हर एक काम हसी की खुशी तो बच्चों के चेहरे पर है कहां है उसे इतनी आज़ादी हसी शायद प्यार का भी है इज़हार जो करती है शब्दों के दरिया को पार मुस्कान यहां भी आती है, चेहरे के थकने के बाद एक हसी "ईमोजी" वाली भी है जो भाषा के बंधन को करती है तार लेकिन बेतुकी सी है ये भी इसका नहीं है कोई प्रभाव जैसे होता है "एक्रोंनीम" छुपी हसी पर  बाकी "लेटर्स" का दबाव और मुस्कान के बारे में और क्या बताऊं वो है किसी का नाम वो ज़ेहन में रहती है, सपनो में आती है रात को बड़बड़ाते हैं उसका नाम खैर मुस्कराहट भी ठीक है  किसी बुद्धिजीवी के चेहरे प...