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निशान-ए-ज़ख्म

औरतों की चमड़ी पर निशान-ए-ज़ख़्म देने वाले दरिंदो को  अगर फांसी पर चढ़ा कर भर दो गे निशान-ए-ज़ख़्म तो चढ़ा दो बेेशक।               पर याद रहे उसकी खुदकुशी की वजह तुम रहे हो।        क्योंकि तुम तो उसे अपने घर की इज्ज़त बना चुके थे ना। तुमने तो ज़बान दी थी ना की पितृसत्ता से बचाओगे उसे अपनी नाकामयाबी का गुस्सा इतना की इन बुज़दिल  दरिंदो पे निकालो गे जिसे।        चलो चड़ा दें दरिंदो को फांसी पे और बैठ जाए घर शांत हो कर।        तभी अगर भेज सकते हो सब्जी लेने शाम को उसे तो बैठ जाओ शांत हो कर। अगर वो कपड़े पहनती है छोटे और तुम्हे कोई डर नहीं, तो शांत बैठो। अगर घूमती है लडको के साथ वो और तुम्हे शक नहीं उसके चरित्र पर, तो शांत बैठो तुम।        अगर दिल टूटे उसका तो उसके पास बैठे तुम, तो शांत बैठो तुम।        अगर पता है कि पति पर निर्भर नहीं होगी वो, तो बैठ जाओ तुम। अगर तुम्हे उसके भविष्य की चिंता करने की जरूरत नहीं, ...

The crooked bus

Smell of puke & kerosene combined With people who are below-poverty-line     The towering residential buildings in the horizon     Appears more magnificent then normal. The awful non-AC seems to envelope all my imagination. Yet there is enough room for sorrow of hundred people     I'm lost in gloom no surprise as      The bus is dimly Litt and seats are broken. Still it's not like the usual bus nor plain neither simple This one has finely crafted dents, shattered windows.     Everything looks to be shaped by precise strikes of hammer.     I wonder if the bus is worth more considering it's handcrafted.

कोशिश

आज फ़िर कुछ नहीं केह पाया। क्या कहूं? शायद कुछ कहना ही नहीं था। बस कहना था कि कोशिश पुरी की मैंने। पर वो भी शायद यकीं से नहीं कहना था।

टेढ़ी कुर्सी

कुर्सी पर बैठा हूं तो दो पैर हवा में है, चार पैर जमीन पर ना आ जाएं इसका डर है मुझे। कभी आते हैं चार पैर जमीन पर तो बस खट्ट कि आवाज़ करने को। खट्ट की आवाज़ आते ही, फ़िर दो पैर हवा में हैं, दो पर अभी भी जमीं पर है।

मेरी शकल पर लोगों को गुस्सा क्यों आता है?

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मेरी शकल पर लोगों को गुस्सा क्यों आता है? क्यूं लोग ऐसे देखते हैं जैसे रंजिश हो कोई हां, माना कि बाल बढ़ा लिए है मैंने, रंग थोड़ा गहरा है और लुक्खों से गाल भी धसे हैं मेरे,      हर पल अभिनय करता हूं,      करता हूं कि सरल दिखूं ,सफल दिखूं,      धूप में कम निकलता हूं तो बेबस महसूस करता हूं,      थकता हूं तो मुनफिक महसूस करता हूं कहता नहीं हूं पर मुझे समझ नहीं आता कि मेरी शकल पर लोगों को गुस्सा क्यों आता है?

A Tempo ride home

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