निशान-ए-ज़ख्म

औरतों की चमड़ी पर निशान-ए-ज़ख़्म देने वाले दरिंदो को 
अगर फांसी पर चढ़ा कर भर दो गे निशान-ए-ज़ख़्म तो चढ़ा दो बेेशक।       
       पर याद रहे उसकी खुदकुशी की वजह तुम रहे हो।
       क्योंकि तुम तो उसे अपने घर की इज्ज़त बना चुके थे ना।
तुमने तो ज़बान दी थी ना की पितृसत्ता से बचाओगे उसे
अपनी नाकामयाबी का गुस्सा इतना की इन बुज़दिल दरिंदो पे निकालो गे जिसे।
       चलो चड़ा दें दरिंदो को फांसी पे और बैठ जाए घर शांत हो कर।
       तभी अगर भेज सकते हो सब्जी लेने शाम को उसे तो बैठ जाओ शांत हो कर।
अगर वो कपड़े पहनती है छोटे और तुम्हे कोई डर नहीं, तो शांत बैठो।
अगर घूमती है लडको के साथ वो और तुम्हे शक नहीं उसके चरित्र पर, तो शांत बैठो तुम।
       अगर दिल टूटे उसका तो उसके पास बैठे तुम, तो शांत बैठो तुम।
       अगर पता है कि पति पर निर्भर नहीं होगी वो, तो बैठ जाओ तुम।
अगर तुम्हे उसके भविष्य की चिंता करने की जरूरत नहीं, तो शांत बैठो तुम।
अरे छोड्डो तुम यार आंदोलन वगैरह बस घर पे शांत बैठो।

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