एक सवाल

ज़िन्दगी भर एक मलाल रहेगा
मेरे जेहन में ये सवाल रहेगा
कि शिद्दत भरी आरज़ू हुई कभी?
की हर तरह का लुभाव हुआ है? 
ख्वाब मेरे ही थे 
की किताबों का प्रभाव हुआ है?
खयाल मेरे ही थे
की यादों का अभाव हुआ है?
विचित्र इस वेश भूषा के पीछे 
छिपे इस विकृत मन
का जन्म अपने आप हुआ है?
की यहां भी मिलावट का इस्तेमाल हुआ है?

Comments

Popular posts from this blog

चश्मुद्दीन

हाथों की पायल