सहुर
सहूर नहीं है तुम्हें तुम
बेसहुरी के पुतले हो।
तुम्हे आता नहीं कुछ भी तुम
सपनों को सच करने निकले हो।
तुम चलोगे कैसे, तुम्हारे तो पैर टेढ़े हैं।
विचार भी विकृत हैं, लिखावट भी टेढ़ी है।
लिबाज़ बेढ़ांगा हैं, दांत भी पीले हैं।
बोलने का ढंग नहीं और मु से बदबू आती है।
मां ने कभी दुलारा नहीं बाप की आंखो के काटे हो।
ये क्या बकवास हैं क्यू अकेले में बड़बड़ाते हो?
रेहते हो अलग-धलग और दोस्त भी ना के बराबर हैं।
अब चुप खड़े क्यूं हो क्या कोई काम नहीं है?
तुम ऐसा करो गाव लोट जाओ
दोस्त बनाओ अनाज उगाओ।
लौटकर वापस मत आना क्योंकि पता है तुम्हें
गावरों की कितनी इज्ज़ करता है ज़माना।
बेसहुरी के पुतले हो।
तुम्हे आता नहीं कुछ भी तुम
सपनों को सच करने निकले हो।
तुम चलोगे कैसे, तुम्हारे तो पैर टेढ़े हैं।
विचार भी विकृत हैं, लिखावट भी टेढ़ी है।
लिबाज़ बेढ़ांगा हैं, दांत भी पीले हैं।
बोलने का ढंग नहीं और मु से बदबू आती है।
मां ने कभी दुलारा नहीं बाप की आंखो के काटे हो।
ये क्या बकवास हैं क्यू अकेले में बड़बड़ाते हो?
रेहते हो अलग-धलग और दोस्त भी ना के बराबर हैं।
अब चुप खड़े क्यूं हो क्या कोई काम नहीं है?
तुम ऐसा करो गाव लोट जाओ
दोस्त बनाओ अनाज उगाओ।
लौटकर वापस मत आना क्योंकि पता है तुम्हें
गावरों की कितनी इज्ज़ करता है ज़माना।
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